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कानून के भक्षक

                
                                                         
                            कंधों पे इनके सितारे हैं,
                                                                 
                            
ये मेरे देश के रखवाले हैं।
पर हाथों में लिए तुम डंडे हो,
अंधे हो!
तनख्वाह जनता सेवा का लेते हो,
पर काम गुंडों का करते हो।
तुम वर्दी में भी अधनंगे हो,
अंधे हो!
जब शपथ लिया सेवा का,
और वचन दिया शासन का,
फिर क्यों लगते वर्दी में देश के गुंडे हो?
अंधे हो!
कुछ वर्दी के, कुछ फर्जी के,
कुछ हाथों से, कुछ लातों से,
तुम पढ़ते बच्चों के दुश्मन हो,
अंधे हो!
ये बच्चे मन के सच्चे हैं,
माना थोड़ा सा कच्चे हैं,
पर तुम तो देश के रक्षक हो,
कानून के तुम, अंगरक्षक हो।
न शर्म तुम्हें, न खौफ तुम्हें,
तुम निखट्ट निकम्में बंदे हो,
अंधे हो,
हां अंधे हो!
-देवेन्द्र विश्वकर्मा "देवराज"
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एक महीने पहले

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