वे क्षत्राणियाँ
माथे पर टीका लगा,
हाथों में खड़्ग थमा,
पति को जो रण में
भेजती थीं—
विजयी होकर ही लौटने का
वचन लेती थीं।
वो क्षत्राणी
क्या कायर थीं?
वेश बदल,
वीर सैनिकों को
सखियों के भेष में
पालकियों में साथ ले गईं,
आक्रांता की कैद से
पति को मुक्त कराया, जिसने
वो वीरांगना,
रानी पद्मावती,
क्या कायर थीं?
फिरंगियों की कैद में पड़ जाय
इससे से पहले, वीर ने
खुद को गोली मार
अपने प्राणों का
बलिदान दिया—
वो चंद्रशेखर आज़ाद,
क्या कायर थे?
जौहर, जान के डर से नहीं किया,
किया अपनी आन-बान की खातिर,
इज़्ज़त-आबरू, उन क्षत्राणियों को
प्राणों से भी प्यारी थी।
वीर राजपूतों की ऐसी
अर्धांगिनियाँ—
क्या वे कायर थीं?
नहीं! कायर नही!
राष्ट्र की आन,
अपने मान के लिए
प्राण अर्पित करने वाली,
वे असाधारण नारियाँ थीं।
रणभूमि में लड़ते-लड़ते
वीरगति पाना भी
अगर होता संभव,
तो वीरांगनाएँ
कब पीछे हटने वाली थीं?
कुत्सित विचारों वाला
वह क्रूर आततायी,
महीनों से किले को
घेरे बैठा था।
मान-सम्मान बचाने का
कोई विकल्प उनके पास
अब कहाँ बचा था?
-देवेंद्र भण्डारी
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