सावन-
कोयला-खदान सा आकाश-
कोलाहल,
दिशा छीलती अबूझ हवाएँ-
निमंत्रण,
उपेक्षित पाषाणों का जलाभिषेक- एकाधिकार,
तप्त धरातल पर तीखी शलाकाएँ-
पाताल-फोड़,
ढलानों पर मटमैली शिराएँ-
विसर्जन
शंख-डमरू-ध्वनि-
श्रद्धा
टप-टप थाप-
नृत्य
हरी दूब की नोक पर टिकी बूंद-
ताजा आसमान I
-देवेन्द्र पंत
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