साकी दे दे जाम जरा,
अँधियारा छा गया !
कल रात प्यास ना बुझ पाई,
कमबख्त सवेरा आ गया l
कल सोचा था पी पी कर के,
मदिरालय खाली कर दूँगा,
इस लाल रंग के कण कण की,
सारी लाली मैं हर लूँगा I
तुम देते जाओगे प्याला,
गिन गिन कर मुझको हाथों में,
क्षण भर की देर भी ना होगी,
सबकुछ खाली मैं कर दूँगा I
पर शुरु हुआ था दौर तभी,
कमबख्त लुटेरा आ गया !
साकी दे दे जाम जरा,
अँधियारा छा गया !
पर आज नहीं चूकुंगा मैं,
मदिरालय करने से खाली,
आज हंडियाँ भर-भर दे,
नहीं कुछ कर सकती लघु प्याली I
आज मेरे मन में, तू सुन,
प्यासा हर जीवन आ गया l
साकी दे दे जाम जरा,
अँधियारा छा गया !
-देवेन्द्र पंत
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