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मुझे देखते ही ज़िक्र छेड़ देते हैं तुम्हारा

                
                                                         
                            मुझे देखते ही ज़िक्र छेड़ देते हैं तुम्हारा,
                                                                 
                            
आदमी को आशिक सताने में बड़ा मज़ा आता है।

वो हाल तो पूछते हैं मगर एक तंज़ के साथ,
झूठी ही सही, लोगों को हमदर्दी जताने में बड़ा मज़ा आता है।

वो यूँ तो कभी महफ़िल में मेरा नाम नहीं लेते,
मगर गैरों की ज़ुबानी मेरा क़िस्सा दोहराने में बड़ा मज़ा आता है।

लोग पूछते हैं मुझसे कि क्यूँ लिखते हो दिल के ज़ख़्म,
इस 'देव' को भी अफ़साना सुनाने में बड़ा मज़ा आता है।
-देवेन्द्र पंत
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3 महीने पहले

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