मुझे रीढ़ दिखाना नहीं आता l
मैं अपनी पूंछ दिखा सकता था ,
दिखाता भी था I
उसे हिला भी सकता था ,
हिलाता भी था I
उसे घुमा भी सकता था ,
घुमाता भी था I
मगर धीरे-धीरे वह बढ़ने लगीI
बढ़ते-बढ़ते वो
बहुत बड़ी हो चली ,
बहुत मोटी और भारी भी I
सम्हाले नहीं सम्हलती I
बजरंगी की तरह मुझे
उसका आसन बनाना नहीं आता I
-देवेन्द्र पंत
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