कभी कभार मन की भी सुन लेना जरा,
मन के भावों को भी सपनों में बुन लेना जरा।
ये दुनिया तो उलझाएगी ता-उम्र बंदिशों में,
तुम बंदिशों से इतर अपनी धुन लेना जरा।
हकीकत की धूप बहुत तल्ख़ है जहाँ में,
सुकूँ के कुछ पल पलकों पे चुन लेना जरा।
दुनिया की किताबें तो पढ़ ली हैं बहुत 'देव',
कभी दिल का कोई पन्ना भी गुन लेना जरा।
-देवेन्द्र पंत
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