सबकी अपनी-अपनी गति है,
कोई कहीं नहीं भाग रहा I
कोई कहीं जो सोया था,
अब अपने वक़्त पे जाग रहा I
कोई छोटा तो कोई लंबा,
कोई बर्फ तो कोई आग रहा I
वक़्त लगेगा, जलेंगे चिराग,
धुएँ में क्यों रंग दाग़ रहा?
मौसम बदलता तभी तो यहाँ,
कभी पतझड़, कभी फाग रहा I
-देवेन्द्र पंत
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