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कोई कहीं नहीं भाग रहा

                
                                                         
                            सबकी अपनी-अपनी गति है,
                                                                 
                            
कोई कहीं नहीं भाग रहा I

कोई कहीं जो सोया था,
अब अपने वक़्त पे जाग रहा I

कोई छोटा तो कोई लंबा,
कोई बर्फ तो कोई आग रहा I

वक़्त लगेगा, जलेंगे चिराग,
धुएँ में क्यों रंग दाग़ रहा?

मौसम बदलता तभी तो यहाँ,
कभी पतझड़, कभी फाग रहा I
-देवेन्द्र पंत
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3 महीने पहले

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