अनसुना मंजर लगती हो,
अनगढ़ा गौहर लगती हो I
डूबने के सिवा करता भी क्या ,
तुम सातों समुंदर लगती हो I
कभी फुहार रिमझिम रिमझिम ,
कभी हवा सी सरसर लगती हो I
निगाहें, नीयत, दिल सब फिसले
मिट्टी से बना संगमरमर लगती हो I
खूबसूरती देखी तरह-तरह की 'देव' '
तुम तरह-तरह से सुंदर लगती हो I
-देवेन्द्र पंत
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