बातों के बाज़ार में देखो,
वादों के अंबार लगे हैं,
सच्चाई को तौल रहे जो,
दुनिया में होशियार लगे हैं।
कह देना तो बहुत सरल है,
जैसे बहती हवा के झोंके,
मुश्किल है उस राह पे चलना,
जहाँ खड़े हों सौ-सौ धोखे।
कथनी तो बस एक प्रतिध्वनि,
हवा में उड़ती तान है,
करनी ही तो असली जीवन,
कर्मों की पहचान है।
ऊँचे मंचों से जो देते,
मानवता को ज्ञान बड़ा,
भीड़ हटी तो ये भी देखा,
स्वार्थ का वो पाषाण खड़ा।
कहने से कब भूखे पेट को,
रोटी का अहसास मिला!
कहने से कब शुष्क धरा को,
सावन अपने पास मिला !
जिस दिन कथनी और करनी में,
दूरी तनिक न रह जाएगी,
उस खिलेगी मानवता,
जग में इतिहास बनाएगी।
-देवेन्द्र पंत
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X