वफ़ा थी वो, जफ़ा थी या, तुम्हें ग़र कशमकश हो तो ,
कभी फ़ुर्सत में मिलना तो, कहेंगे राज़ हर दिल का I
नज़र की बेरुख़ी को हम, समझ बैठे थे नादानी ,
मगर अब जा के समझा दिल, तक़ाज़ा उस तग़ाफ़ुल का I
जो दुनिया की निगाहों में, महज़ इक हादसा ठहरा ,
वही तो वाक़िया निकला, हमारी ज़ीस्त की मुश्किल का I
गिला तुमसे नहीं कोई, न शिकवा इस ज़माने से ,
कि हम ख़ुद ही न पढ़ पाए, लिखा अपनी ही तक़दीर का I
धुआँ जो उठ रहा है 'देव', वो यूँ ही नहीं उठता ,
गवाह ये भी रहा होगा, किसी सुलगते हुए दिल का I
-देवेन्द्र पंत
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