बात कभी न निकलेगी हमें मालूम है,
चर्चा शुरू भी हो तो बढ़ेगा कभी नहीं I
दुनिया समझ रही है कि हम टूट जाएँगे,
यह खेल उस की चाल से चलेगा कभी नहीं I
रहने दिया है दिल में उसे इक चिराग़ सा,
यह वो धुआँ है जिससे दम घुटेगा कभी नहीं I
मौसम बदल रहे हैं बदलती है ज़िन्दगी,
यादों का ज़र्द पत्ता गिरेगा कभी नहीl
तारीकियों से डर नहीं लगता है अब उसे,
सूरज जो बुझ गया है जलेगा कभी नहीं I
-देवेन्द्र पंत
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