धूप को कतरन-कतरन कर,
आषाढ़ चुपचाप
पगडंडी से उतर गया।
वह छोड़ गया है—
जेठ की झुलस का बाकी हिसाब— क्षितिज पर राख जैसी धुंध—
विरहन हवा की गीली साँस—
और अतृप्त मिट्टी की बेचैनी—
सावन के लिये I
-देवेन्द्र पंत
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