धूप से काला चेहरा, हाथों में छाले,
फिर भी मन में उम्मीदों के सपने पाले।
ईंट-गारा, पसीना और पथरीली राह,
उसी से बनती है दुनिया की चाह।
ना छुट्टी, ना त्योहार, ना कोई आराम,
बच्चों की रोटी के लिए करता है काम।
सर्दी की ठिठुरन, गर्मी की मार,
सब सहकर भी नहीं छोड़ता अपना काम।
आसमान को छूते महल वो बनाता,
खुद झोपड़ी में रात बिताता।
सड़क, पुल, घर सब उसकी देन,
फिर भी दुनिया पूछे ,तू है कौन?
अपने बच्चों के लिए धूप में बैठकर पत्थर तोड़ता ।
वह रोता नहीं, शिकायत नहीं करता ,
बीमार हो जाए तो गम नहीं,
थक जाए तो आराम नहीं ।
बस एक उम्मीद कि अतिरिक्त कार्य से,
कल थोड़ी ज्यादा मजदूरी मिल जाए।
और परिवार का पालन पोषण आसान हो जाए।
सलाम उसे मजदूर का जिसके पसीने से ,
दुनिया की गगन चुंबी इमारतें दिखती ।
सलाम है उस मजदूर को, जिसके मेहनत से ऐतिहासिक इमारतें बनती,
जो एक विरासत के रूप में पहचान बनाती।
और संसार में अपना नाम कमाती।
-देवेंद्र मणि पाण्डेय
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