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नटखट तितली

                
                                                         
                            तुम चोरी से आकर,
                                                                 
                            
‎मेरे पास बैठ जाती हो।
‎ओ थीव्या बताओ तो,
‎मेरी खुशबू चुराकर,
‎तुम कहाँ जाती हो?
‎
‎हम कहे बाग़ के मालिक से,
‎पहरा दिया करो दिन भर।
‎यहाँ अजीब घटनाएँ होती हैं,
‎दो पंख फैलाए आती है कोई,
‎हर दिन खुशबू की चोरी होती है।
‎
‎कैसी चालाक तितली हो,
‎हमें बातों में फँसाती हो।
‎पंख मारकर बेरहमी से,
‎खुद को इत्र लगाती हो।
‎
‎बड़ी ही नटखट हरकतें तुम्हारी,
‎कहाँ से सीखकर आती हो?
‎मेरी कली के पीछे छिपकर,
‎हमीं से नैन लड़ाती हो।
‎
‎कभी आती हो हमारे पास,
‎कभी जाती हो चमेली के पास।
‎ये किस कदर इश्क़ निभाती हो,
‎पंखों में लगाकर खुशबू हमारी,
‎हमीं को छोड़कर जाती हो।
‎
‎दिन भर बैठती हो मेरे संग,
‎रात को गुलाब बहलाती हो।
‎हम पागल बनकर राह निहारें,
‎और तुम कही और मंडराती हो l
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2 महीने पहले

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