आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तिलक और विदाई

                
                                                         
                            जिस हाथ से तिलक लगाया जाता है,
                                                                 
                            
उसी हाथ से विदाई भी हो जाती है।
ऊपर चढ़ाना और नीचे लाना,
दोनों का हिसाब पंच शक्तियों के पास रहता है।

गणपति विघ्न हरते हैं, रास्ता बनाते हैं।
वही बुद्धि दें, तो इंसान राजा बन जाए।

ब्रह्मा सृजन करते हैं, नया जन्म देते हैं।
वही जब चाहें, पद और प्रतिष्ठा दे दें।

विष्णु पालन करते हैं, संकट में थामते हैं।
वही जब चाहें, ताज सिर पर रख दें।

महेश संहार करते हैं, अभिमान तोड़ते हैं।
वही जब रौद्र रूप लें, तो सिंहासन हिल जाए।

मां दुर्गा शक्ति देती हैं, हौसला बढ़ाती हैं।
वही जब कृपा हटाएं, तो सब शून्य हो जाए।

पंचतत्व भी गवाह हैं इस खेल के।
जल डुबोता भी है, और पार भी लगाता है।
आकाश छाया भी देता है, और गिराता भी है।
वायु उड़ाती भी है, और गिराती भी है।
पृथ्वी सहारा भी देती है, और समा भी लेती है।
अग्नि तपाती भी है, और भस्म भी कर देती है।

पंच शक्तियों के आदेश से जब बाण चलते हैं,
तो वही आशीर्वाद भी देते हैं, और चेतावनी भी बन जाते हैं।

इसलिए गुरूर मत करना देह का,
न पद का, न ताज का।
क्योंकि तिलक भी उन्हीं के हाथ में है,
और विदाई भी उन्हीं के हाथ में है।

पंच शक्तियां कृपा तो उन पर बनाए रखती हैं,
जो अपने सकारात्मक सपनों पर अडिग रहते हैं।
नकारात्मक शक्तियां ज्यादा नहीं टिकतीं।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर