रुकी हुई नदी का पानी,
सड़कर बदबू देने लगता है।
और जो संघर्ष से डर गया,
वो कहाँ खिल पाता है।
मिट्टी तभी सोना बनती है,
जब भट्टी में तपती है।
मैं खुद वो मिट्टी हूँ,
जो रोज खुद को तपाती है।
सूरज तभी रोशनी देता है,
जब खुद से जलता है।
पाँव में जब छाले पड़ते हैं,
तभी तो मंजिल करीब आती है।
वायु बिना चिंगारी कैसे जलेगी,
बिना आग के लोहा कैसे पिघलेगा।
और बिना पानी के दरिया कैसे चलेगा,
जब पानी चलेगा तो पत्थर भी पिघलेगा।
मेरे संघर्ष में आँसू भी हैं,
वो भी पानी ही तो हैं।
मेहनत का पसीना,
वो भी दरिया ही तो है।
बिना आग के लोहा बोलो,
कब बन पाया है तलवार।
बिना घाव के पत्थर से,
कब निकला है झरने का द्वार।
कभी मन करता है बैठ जाऊँ,
पर आत्मा कहती बैठना ही हार है।
फिर दिमाग कहता है अब बहुत हो गया,
तब जमीर कहता है अभी सफर बाकी है।
जो सीखा है उसे,
बाँटे बिना रहा नहीं जाता।
कुछ टूटकर जुड़ना बाकी है,
कुछ बिखरकर सँवरना बाकी है।
खुद के लिए भी जीना बाकी है,
औरों के काम आना बाकी है।
और जो अब तक अंजान हैं,
उनसे दिल का रिश्ता जोड़ना बाकी है।
राह चलने वाले को देखो,
पैर कभी आराम नहीं करते।
हर सुबह एक नया सवाल है,
जिसे जिद से हल करना पड़ता है।
जीत हार का हिसाब नहीं है,
बस चलते जाना दस्तूर है।
अपनी मुट्ठी में जो सपना है,
हर चेहरे पर मुस्कान लाना मंजूर है।
ये लड़ाई कभी थमती नहीं,
ये जीवन का संविधान है।
जो रुका वो मिट गया,
और मैं अभी जूझ रहा हूँ,
किसी की मुस्कान बनने के लिए,
इसलिए मेरा वजूद है।
- देवकी नन्दन गहतोड़ी
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