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ज़िंदगी तो गुज़र रही है मगर

                
                                                         
                            शिकायत तो कभी नहीं की मैंने,
                                                                 
                            
ओढ़ ली ख़ुद पर ख़ामोशी मैंने।

कोई जब पूछता है हाल-ए-दिल,
दिखा दी चेहरे पर ख़ुशी मैंने।

ज़ख़्म दिल में ही छिपाए रखे,
आँख भरने न दी कभी मैंने।

जिसे समझा था हमनशीं अपना,
उसकी ख़ातिर शिकस्त ली मैंने।

ज़िंदगी से मिलीं दुश्वारियाँ,
मुस्कुरा कर सभी सही मैंने।

ज़िंदगी तो गुज़र रही है मगर,
"शमीम" तन्हा तन्हा जी मैंने।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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एक घंटा पहले

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