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ज़माना मोहब्बत का

                
                                                         
                            आता है याद अब भी ज़माना मोहब्बत का,
                                                                 
                            
तुम ने भुलाया क़िस्सा पुराना मोहब्बत का।

अनजान था अंजाम-ए-उल्फ़त से दिले-नादाँ,
जोश-ए-जुनूँ था रोग बसाना मोहब्बत का।

थी फ़स्ले-गुल: दिल के चमन में फूल खिले थे
मुरझा गया ख़िज़ाँ में गुल-ए-राना मोहब्बत का।

तुम ने तो सब वादे मोहब्बत के भुला दिए,
एक पल में लुट गया वो ख़ज़ाना मोहब्बत का।

हम किस तरह भुला दें वो मय से भरी आँखें,
जिन से कभी पिया था पैमाना मोहब्बत का।

तुम को नहीं हैं रंज-ओ-ग़म तर्क-ए-मोहब्बत का
बेहतर है "शमीम" हमें भी भुलाना मोहब्बत का।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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3 महीने पहले

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