कोई ईश्वर कहे तो कोई कहे ख़ुदा उसको,
वो एक है चाहे जिस नाम से बुला उसको।
हर लम्हा और हर वक्त तेरे साथ में रब है,
वो तेरे पास है कहाँ जाकर ढूंढना उसको।
हवा में और फ़िज़ा में हर शय में वही तो है,
निज़ाम उसी का है हर सिम्त देखना उसको।
नहीं वाक़िफ तू अपनी मंज़िल-ए-मक़सूद से,
पता है तेरी मंज़िल और तिरा रस्ता उसको।
उसकी रहम-नज़र हर वक्त हम पर रहती है,
हमने सजदा कभी किया या न किया उसको।
दिल धड़कता है साँस चलती है उसके दम से,
"शमीम" हमने ख़ुदी में महसूस किया उसको।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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