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वस्ल-ओ-तरब

                
                                                         
                            तेरी नज़र जो झुका करती है।
                                                                 
                            
कोई पयाम दिया करती है।

तेरे लबों पर छाई ख़ामोशी,
बहुत कुछ हमसे कहा करती है।

हसीन याद वस्ल-ओ-तरब की,
साथ हर लम्हा रहा करती है।

तू वही तो है सूरत जिसकी,
शीशा-ए-दिल में बसा करती है।

वो पल कितने हसीन होते हैं,
तू जब क़रीब हुआ करती है।

रहगुज़र फूलों से भर जाती है,
जहाँ तू साथ चला करती है।

"शमीम" ख़्वाबों और ख़यालों में ,
मेरी हमदम तू रहा करती है।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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3 महीने पहले

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