तुम्हारा साथ नहीं है कोई हमदम नहीं होता,
कोई हमराह और कोई हमक़दम नहीं होता।
वही हैं रास्ते पर दूर तक बिखरी है तन्हाई,
समाँ बदल गया, पहले सा आलम नहीं होता।
इस राहे-ज़िन्दगी में तो कई लोग मिलते हैं,
साथ कोई भी उम्र भर यहाँ पैहम नहीं होता।
जो ज़ख़्म पाए उनकी यादें ही रह गईं बाक़ी,
जो दर्द-ओ-ग़म मिले उनका मरहम नहीं होता।
तुम्हारी यादों का साया जुदा अब तक नहीं हुआ,
मुद्दतें हो गईं बिछड़े फिर भी मद्धम नहीं होता।
फ़लक पर रोज़ आफ़ताब निकलता तो है मगर,
"शमीम" ज़ुल्मो-सितम का अंधेरा कम नहीं होता।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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