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तुझे पाया तो ताबीर-ए-ख़्वाब मिल गई है,

                
                                                         
                            तिरे ख़यालों से फ़ुर्सत नहीं होती मुझ को,
                                                                 
                            
यादें होती हैं, ख़ल्वत नहीं होती मुझ को।

दूर रहकर भी तसव्वुर में तू साथ होती है,
महसूस तेरी फुरक़त नहीं होती मुझ को।

साथ तू हो तो मुझे चैन-ओ-सुकूँ रहता है,
और कोई भी अज़िय्यत नहीं होती मुझ को।

तुझे पाया तो ताबीर-ए-ख़्वाब मिल गई है,
अब कोई और हसरत नहीं होती मुझ को।

रुख़े-रौशन पे तबस्सुम यूँ ही सलामत रहे,
सिवा इसके कोई चाहत नहीं होती मुझ को।

"शमीम" तुझ से ही रौशन हैं उम्मीदों के दीए,
हमसफ़र तू है तो ख़ैबत नहीं होती मुझ को।
- देवेन्द्र सचदेवा " शमीम"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
42 मिनट पहले

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