तुमसे गिला या शिक़वा भी नहीं है,
पर जो चाहा था मिला भी नहीं है।
अब वो मरासिम ही नहीं रहा तो,
दरमियाँ तो कोई मुद्दआ भी नहीं है।
मिलें राहों में वो तो नज़रें चुराते हैं,
अब वो निगाह-ए-आशना भी नहीं है।
हमारी चाहत है तू ख़ुश रहे सदा,
क्या हुआ गर तू हम-नवा भी नहीं है।
तेरा दुनिया यूँ ही सदा आबाद रहे,
मेरे जहाँ में गुल खिला भी नहीं है।
जुदा होकर तू ने हमको भुला दिया,
चिराग़ यादों का बुझा भी नहीं है।
निगाहे-शौक तेरी मेहरबाँ नहीं "शमीम",
दिल में कोई तेरे सिवा भी नहीं है।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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