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तिरी चाहत में

                
                                                         
                            तू नहीं है हमारी क़िस्मत में,
                                                                 
                            
मिली रुसवाईयाँ मोहब्बत में।

एक पत्थर को पूजते रहे हम,
कुछ न पाया मगर इबादत में।

चाह थी फूलों की ख़ार मिले,
दर्द-ओ-ग़म पाया तिरी चाहत में।

यहाँ पर बिकती है हरेक शय,
तिजारत होती है मोहब्बत में।

लुटा बैठे हम सब कुछ अपना,
क्या रखा है अब शिकायत में।

दिल लगाकर हुई ख़ता "शमीम",
हो गई ये ख़ता तो ग़फ़लत में।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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2 घंटे पहले

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