रहगुज़र में मेरी नक्श-ए-पा नहीं मिलता,
और मंज़िल का कोई रास्ता नहीं मिलता।
यूँ तो हमराह कितने साथ साथ चलते हैं,
मगर कोई यहाँ अपना सा नहीं मिलता।
मैख़ाने तो इस दुनिया में कितने हैं मगर,
निगाह-ए-यार के जैसा नशा नहीं मिलता।
गुनाह करते हैं फिर भी पशेमाँ नहीं होते,
क्यों दिलों में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा नहीं मिलता।
अंधेरे हर तरफ हैं कोई आवाज़ भी नहीं,
किसी इंसान का यहाँ पता नहीं मिलता।
कितने ही लोग मिलते और बिछड़ते हैं,
उम्रभर साथ निभाए ऐसा नहीं मिलता।
नज़र आते हैं जो सफ़ेदपोश दुनिया को,
"शमीम" उनमें कोई पारसा नहीं मिलता।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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