हसरतें अपनी भूलाना आ गया,
अब हमें भी ग़म छुपाना आ गया।
वक्त ने हर ज़ख़्म जैसे भर दिया,
अब हमें भी मुस्कुराना आ गया।
वक्त बदला और हम बदल गए,
इक नया चेहरा दिखाना आ गया।
इक कहानी ख़त्म हुई भूल गए,
और एक नया फ़साना आ गया।
आगे हर मक़ाम से भी रास्ता है,
हम चले नया ठिकाना आ गया।
साथ चल सके नहीं गर "शमीम",
रास्ता वो छोड़ जाना आ गया।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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