दिल में फ़क़त ख़याल आप के पिरो लिए,
कितने ही ख़्वाब हमने आप के संजो लिए।
हमसे कहो कुछ और कुछ हमारी भी सुनो,
बातों में मोहब्बत की गुफ़्तगू भी घोलिए।
हैं आप परेशाँ तो हम भी बेज़ार से रहते हैं,
क्यूँ हो ख़फ़ा हमसे हुज़ूर कुछ तो बोलिए।
कितने सवाल दिल को बेक़रार करते हैं,
जब आप ने पलकों के किनारे भिगो लिए।
मुस्कुराइए ज़रा चमन लाला-ज़ार कीजिए,
रौनक-ओ-रानाई फ़िजाओं में ज़रा घोलिए।
जो भी सज़ा दोगे गवारा हमको है "शमीम",
क्या हो गई ख़ता कि यूँ ख़ामोश हो लिए।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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