ज़ेहन में हैं जो सवालात किसे पेश करूँ,
कौन सुनता है दिल की बात किसे पेश करूँ।
तुम से उम्मीद थी तुम ही समझ सके न मुझे,
तुम्हीं बताओ अपने जज़्बात किसे पेश करूँ।
बज़्म में आ तो गए हैं मगर कश्मकश ये है,
साज़ ही जब नहीं तो नग़्मात किसे पेश करूँ।
सभी मसरूफ हैं यहाँ ख़ुद अपने मसलों में,
किसे फ़ुरसत शुऊर-ए-ज़ात किसे पेश करूँ।
जो मेरे अपने थे; होते गए जुदा बारी बारी,
मैं अपनी ख़्वाहिश-ए-नशात किसे पेश करूँ।
"शमीम" चाँद खोया है तारे नज़र नहीं आते,
गुज़र रही है जो तन्हा रात किसे पेश करूँ।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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