जुल्फ़ों को अपने चेहरे से आप हटा दो,
पुरनूर रुख़े-रौशन से फ़िज़ा को बना दो।
हम तो आप पर दिल निसार करते हैं,
क्या आप के दिल में है हम को बता दो।
दीदार को कब से तरसी हैं मेरी आँखें,
आ जाओ तरसी आँखों की प्यास बुझा दो।
मैं हूँ मरीज़-ए-इश्क़ बेक़रार रहता हूँ,
अब आप ही इस मर्ज़ की कोई दवा दो।
आँखें हैं जैसे मय के छलकते हुए प्याले,
हमसे नज़र मिलाओ और मदहोश बना दो।
बिन आपके "शमीम" वीराँ है मेरी दुनिया,
आकर ज़िन्दगी में जहान मेरा सजा दो।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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