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इतनी हसरत है

                
                                                         
                            पहले जैसे अब हम और तुम नहीं,
                                                                 
                            
लेकिन इसका हमको कोई ग़म नहीं।

अब मरासिम अपने दरमियाँ नहीं ,
यादें मगर माज़ी की तो कम नहीं।

तेरे बिन भी मुस्कुरा कर जी रहे हैं,
और कोई सोज़-ए-दम-ब-दम नहीं।

राहे-ज़िन्दगी में मिल जाएगी मंज़िल ,
ग़म नहीं गर कोई हमक़दम नहीं।

जिनमें क़ैद हम उलझ कर हुए थे,
तेरी ज़ुल्फ के वो पेच-ओ-ख़म नहीं।

इतनी हसरत है "शमीम" ख़ुश रहे तू,
तेरी दुनिया में हो कभी ज़लम नहीं।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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2 महीने पहले

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