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इंसान हूँ मैं और तू भी

                
                                                         
                            चलो नफ़रत को मिटाया जाए,
                                                                 
                            
अम्नो-अमान फिर लाया जाए।

एक हैं हम कोई रंजिश नहीं है,
सारी दुनिया को दिखाया जाए।

मसाइल दरमियाँ बेमानी हैं,
उन्हें हर दिल से भुलाया जाए।

जियें हम औरों को भी जीने दें,
ऐसा माहौल बनाया जाए।

ईद का दिन हो या हो दीवाली,
साथ मिलजुल के मनाया जाए।

फूल हर रंग के खिलते हों जहाँ,
चमन शादाब साजाया जाए।

"शमीम" इंसान हूँ मैं और तू भी,
बस यही जज़्बा जगाया जाए।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 घंटे पहले

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