हिज़्र के ग़म की फ़रावानी से,
दिन गुज़रते हैं परेशानी से।
बात दिल की बयाँ करते हैं,
हम अपनी ग़ज़ल-ख़्वानी से।
मिली उल्फ़त में रुस्वाई हमें,
तेरी जफ़ा की मेहरबानी से।
बेख़बर इश्क़ के अंजाम से हम,
लगा बैठे थे दिल नादानी से।
सजाए थे जो ख़्वाब टूट गए,
रह गए हम एक फ़ुगानी से।
हैं परेशान और पशेमाँ हम,
"शमीम" ख़ुद की सर-गिरानी से।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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