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दिल-ए-ग़ुमशुदा

                
                                                         
                            यादों को तेरी दिल से भुलाया न जाएगा
                                                                 
                            
बार-ए-जुदाई हम से उठाया न जाएगा।

तर्क-ए-मोहब्बत से हमें जो ज़ख़्म मिले हैं,
वो दर्द किसी को भी दिखाया न जाएगा।

माज़ी की यादें अब भी मेरे साथ साथ हैं,
मीलों तलक लम्हों का हमसाया न जाएगा।

तारीफ में तेरी जो नग़्मे हमने लिखे थे,
महफ़िल में तेरी अब कोई गाया न जाएगा।

रातें मेरी अब तन्हा-ओ-वीरान कटती हैं,
नींदों में ख़्वाब अब तो सजाया न जाएगा।

मुझ में अगर चाहो भी तो चाहत न मिलेगी,
दिल-ए-गुम-शुदा "शमीम" पाया न जाएगा।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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2 महीने पहले

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