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अंजाम-ए-उल्फ़त

                
                                                         
                            इश्क़ो-उल्फ़त के दिलनशीं वो ज़माने देखे,
                                                                 
                            
साथ साथ हमने कितने ख़्वाब सुहाने देखे।

हमको बिस्मिल कर के जो दिल में उतरे थे,
तीर-ए-नज़र के तुम्हारे हमने निशाने देखे।

तुमने मोहब्बत में हमसे कुछ वादे किए थे
दूर तुम को जाना था तो बनाए बहाने देखे।

बेख़बर अंजाम-ए-उल्फ़त से रहे फ़ना हुए,
जलते हुए लौ में शमा से भी परवाने देखे।

दूर तक तन्हाइयाँ हैं और अंधेरे चार सू हैं,
तुमसे बिछड़ कर हमने सियाह-ख़ाने देखे।

अपने आप से ही हम समझाते हैं ख़ुद को,
हमने अपने ही "शमीम" आइना-ख़ाने देखे।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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2 महीने पहले

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