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और यादों में रुख़-ओ-ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम था।

                
                                                         
                            दिल की हरेक धड़कन में बस तेरा ही नाम था
                                                                 
                            
और यादों में रुख़-ओ-ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम था।

दीदार की हसरत लिए गुज़रते थे तेरे कूचे से,
और मेरी नज़र में वो तेरा ही बाला-ए-बाम था।

अहले-जहान में हर लब पर थी हमारी दास्तां,
एक ज़माना वो भी था हमारा चर्च-ए-आम था।

तुझसे जब नज़रें मिलें मदहोश हो जाते थे हम,
बेख़ुद-ओ-बेक़रार हमें करता बादा-ओ-जाम था।

वक्त जब बदला तो फिर हालात भी बदल गए,
अपनी राह-ए-उल्फ़त पर गर्दिश-ए-अय्याम था।

यादों से वाबस्ता हैं वो दिन और वो लम्हे "शमीम" ,
और ये यादें ही उन गुज़रे लम्हों का अंजाम था।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
53 मिनट पहले

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