जहाँ देखो तिजारत हो रही है,
रिश्तों में भी ख़यानत हो रही है।
देखते हैं जब हम अहले-दुनिया,
देखकर हमको हैरत हो रही है।
कोई हमदर्द किसी का नहीं है,
ये जानकर अज़िय्यत हो रही है।
नाम पर जात और मज़हब के,
मुल्क में अब सियासत हो रही है।
जज़्ब-ए-मोहब्बत अब रहा नहीं,
और दिलों में नफ़रत हो रही है।
दर्द इन्साँ का समझते नहीं हैं,
पत्थरों की इबादत हो रही है।
मेहरबाँ आप हैं हम पर "शमीम"
किस सबब ये इनायत हो रही है।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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