एतबार की पुनर्रचना
हाँ, अब मैं शहज़ादा नहीं रहा,
तेरे टूटे हुए एतबार का
पहरेदार बनना चाहता हूँ।
मैं फ़तह नहीं चाहता तुझे,
मैं चाहता हूँ तू अपने आप से
फ़ारिग़ हो जाए, मेरे पास आकर।
मैं जानता हूँ,
तेरी ख़ुद्दारी ही तेरी पनाह है,
और मैं उस पनाह को तोड़ने नहीं,
उसमें रहने आया हूँ।
तुझे अब ताज नहीं चाहिए,
तुझे सच्ची नीयत चाहिए,
और मेरी नीयत में
तेरे सिवा कोई ख़्वाब नहीं।
तू मौजूदगी मत देख,
मेरी नीयत देख,
वहीं पर तेरा टूटा हुआ एतबार
फिर से जुड़ रहा है।
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