अधूरी-सी ज़िंदगी
इक दर्द छुपा हो सीने में,
तो मुस्कान अधूरी लगती है,
जाने क्यों बिन तेरे,
मुझको हर शाम अधूरी लगती है।
कहनी है तुमसे दिल की जो…
वो बात ज़रूरी लगती है,
तेरे बिन मेरी ग़ज़लों की
हर आवाज़ अधूरी लगती है।
दिल भी तेरा… हम भी तेरे…
बस एक आस ज़रूरी लगती है,
अब बिन तेरे मेरे दिल को
हर साँस अधूरी लगती है।
माना जीने की राहों में
हर ख़ुशी ज़रूरी लगती है,
जाने क्यों, “मन” को तेरे बिन
ज़िंदगी अधूरी लगती है।
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