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दिल आ गया है

                
                                                         
                            उस मासूमियत पे दिल आ गया है ।
                                                                 
                            
वो अंदाजे मुस्कां मुझे भा गया है ।।

आंखों में उसकी समुन्दर है मय का ,
मैं मयकश नहीं पर नशा छा गया है ।

उसकी सूरत नहीं सीरत पे फिदा हूंँ ,
वो मुझे देख जबसे शरमा गया है ।

न जाने कब अपनी शब ए ईद होगी ,
जमानों से शिकवा यूं ही आ गया है ।

मिलूँ भी तो कैसे, भुलाऊं भी कैसे,
वो ख्वाबों में मुझको तड़पा गया है ।

न था कोई तूफां, न थी कोई हलचल ,
मार कंकर वो दरिया को मचला गया है ।

मुझे रातें भूलीं ,मैं रातों को भूला ,
वो कानों में चूड़ियां जो खनका गया है ।

उस मासूमियत पे दिल आ गया है ।
वो अंदाजे मुस्कां, मुझे भा गया है।।
-देवेन्द्र सिंह चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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