जब मानव धरती पुत्र बनकर आया;
तब वह एक भिखारी था।
जैसे ही बड़ा हुआ बिगड़ने लगा;
अनमोल जीवन का रहस्य;
उसे समझने में वक्त लगने लगा।।१।।
वह चांद बनना चाहता था;
सूरज के तरह गर्म होकर तपने लगा।
तेज रौशनी के साथ साथ;
हवा में निरन्तर बहने लगा।
मांगना चाहता था ही कि _
दाता बनकर कुछ कुछ देने लगा।।२।।
सुन्दर जीवन पाकर भी यहाँ;
संगत में पड़कर बदलने लगा।
लेकर कुछ जाना नहीं था उसे;
तथापि ले जाने की सोचने लगा।।३।।
उसे यहाँ की हवा ने रोका भी;
लेकिन पानी की तरह बहने लगा।
यह दुनियां बड़ी अचरज भरी है;
जिसमें सिहरकर स्वयं कहने लगा।।४।।
-देवनन्दन कुमार
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