अब लौट नहीं पाएगी मेरी बचपना
कल्पना के उस दौर से गुजर रहा हूँ।
फांकते रहते थे मुट्ठी भरके धूल कण,
उसी धूल कण से आँखें मल रहा हूँ।।
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