सखी! मन नहीं मानत यौवन के,
पूरब पश्चिम से बहे मलय बयार।
दरस परस बिन बरसे कजरिया,
रिमझिम बरसे नैन भादौ फुहार।।१।।
विस्मृत विस्मय विपुल व्यथा से,
सखी मन डोल रहे विरह विकार।
पीर बढ़ी अब धीरज न मन माने,
रूप लावण्य बरसे बहुत लाचार।।२।।
सुगम स्वर में सुगम गान सखी हे,
विरह मिलन की सुरभित आधार।
सखी! मन नहीं मानत यौवन के,
पूरब पश्चिम से बहे मलय बयार।।३।।
-देवनन्दन कुमार
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