निर्जन वन- उपवन, नदी - नालाएं,
गिरी कंदराएं, शान्त कोमल लताएं,
प्रेम परिधि पर पलकर सुयश में।
हां, हां! सब परमात्मा के वश में।।१।।
चिर निद्रा में सुषुप्त पाषाण यहाँ,
युगों - युगों से पड़ा गुमनाम यहाँ,
रात्रिचर_ घनघोर गुफा के तम में,
हां, हां! सब परमात्मा के वश में।।२।।
हिमगिरि का आलय किरीट यहाँ,
गंगा - यमुना की पवित्र धार यहाँ,
तरंगें उफनती उर की शांत वन में।
हां, हां! सब परमात्मा के वश में।।३।।
खग - विहग की नव कुहुक यहाँ,
नव नव पर नव निर्मित गीत यहाँ,
मधुर लय है, मधुर धुन उपवन में।
हां, हां! सब परमात्मा के वश में।।४।।
मूक - वधिर, वक्ता वाचाल यहाँ,
मितभाषी - मधुरभाषी खूब यहाँ,
अनन्त क्षितिज, अनन्त गगन में।
हां, हां! सब परमात्मा के वश में।।५।।
कायर - मन, कुटिल वचन यहाँ,
स्वच्छ विचार, सुन्दर नयन यहाँ,
सब अपने धुन में और मगन में।
हां, हां! सब परमात्मा के वश में।।६।।
मानव - जीवन, उत्तम रचन यहाँ,
अमृत सम ज्ञान, उत्तम वचन यहाँ,
नर - नारायण सब एक जतन में।
हां, हां! सब परमात्मा के वश में।।७।।
आत्म तत्व की अमर खोज यहाँ,
सम - विषम की उक्ति रोज यहाँ,
व्योम पथ के तेज रथ स्व मन में।
हां, हां! सब परमात्मा के वश में।।८।।
उच्च तेज ज्वर लहर सिहर यहाँ,
उत्तम, मध्यम, निम्न नियम यहाँ,
जल तरंग, ध्वनि तरंग ये यश में।
हां, हां! सब परमात्मा के वश में।।९।।
क्षिति, जल, अनल, समीर यहाँ,
गीत, संगीत, मीत, प्रीत, है यहाँ,
नामित नयन नित निर्जन वन में।
हां, हां! सब परमात्मा के वश में।।१०।।
-देवनन्दन कुमार "बरहथिया"।
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