एक छोटा सा गांव है बरहत्था,
किशनपुर प्रखंड जिला सुपौल में।
इसी वसुंधरा पर मेरा आगमन,
जन्म हुआ है अक्टूबर पचासी में।
तब से ही देख रहा हूं बहते हुए,
कलकल तेज जल धारा प्रवाह में।
मेरे पिताजी, दादाजी, माताजी,
इसके तट पर बैठ पूजा अर्चना में।
पुरखों ने विविध कर्म कर चले,
चल बसे हैं नदी बह रही रफ़्तार में।
इन्हें मै देखता हूं मुझे याद आती,
अपने पिता की सूखती हुई धोती,
जल तरंग में नहाते, सूर्योपासना में।
मैं उस क्षण को नहीं भूलता कभी,
मेरी मां भी पर्व त्योहार खूब करती,
करती जीतिया, रवि डोरा, घर में।
अजब करिश्मा है इस प्रकृति की,
मेरे गांव की तिलावे नदी आज भी,
उसी वेग में, उसी प्रवाह में बहती,
इसकी अपनी धार है, और लहर में।
ये तो सदैव बहती रहेगी निर्बाध,
पड़ते जो भी राह में होते बर्बाद,
ये कभी नहीं सूखती भरी रहती,
कितने गोद भर दिए इस गांव में।
ये गांव की शान भी पहचान भी,
फसलें सिंचित करती स्व जल से,
यह बहती है जिधर, सुख देती है,
मवेशी लोट पोट कर नहाती इसमें।
बरसात के मौसम में तो उफनती है,
जल स्तर हमेशा घटती शीत ऋतु में।
युग युग से बह रही यह तिलावे नदी,
बहुतों के गले भी सुख गए हैं इसमें।
समा गए हैं न जाने कितनी हस्तियां,
इसके बहते हुए प्रचुर प्रखर प्रवाह में।
मैं रोज उठकर दर्शन करने जाता हूं,
जब नहाता हूं भुवन भाष्कर के तरफ,
मुड़कर बड़ी उत्सुक होकर जल देता हूं।
तब याद आती है, फिर वही सब बातें,
मैं भी नहीं रहूंगा, यह बहेगी तीव्र तरंग में।
याद रखना समय से जमाना बदलता है,
बदलती है नीयत तो नज़ारा बदलता है।
लोग लोभ लेकर लुभा लेते परिजन को,
इस नदी को मतलब नहीं न अभिमान है।
यह आज भी बह रही है कल भी बहेगी,
पर मैं रोज नहाने, देखने न आ पाऊंगा।
-देवनन्दन कुमार
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