मन लगा रही यूं ही अपना,
जीवन के डोरे डाल रही मैं।
खुद खोज रही अभिप्सित,
चंचल मन से गुहार रही मैं।।१।।
झलक देख देख कर ही,
तुझमें छवि निहार रही मैं।
बेमौसम बर्षा बरस रही है,
रुत हवा की बिसार रही मैं।।२।।
सपनों के आंगन में खिले,
नव फूल नित दुलार रही मैं।
सुन्दर सुखद अनुभूति पर,
मन रूपों में बिसार रही मैं।।३।।
तेरे आने पर हवा बदली है,
उस रुख को समझ रही मैं।
तूं ही सहारा बस मेरा होगा,
अविरल प्रेम पकड़ रही मैं।।४।।
ये अम्बर खुशी मनाता है,
व्योम मंडल निहार रही मैं।
देख क्षितिज की अंगड़ाई,
मन तो तुझमें भूला रही मैं।।५।।
-देवनन्दन कुमार
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