जग में हंसाई, जग में रूलाई,
मधुर मिलन की आस नहीं है।
किसको बताऊं? कैसे बताऊं?
पिया तो नयनों के पास नहीं है।।१।।
सूरत उनकी घूम रही दर्पण में,
ओछे मन में मानो सांस नहीं है।
याद हमेशा आती मन अर्पण में,
मधुर मिलन की आस नहीं है।।२।।
कोमल पंखुड़ियों में छिपकर मैं,
देख रही हूं, कोई प्यास नहीं है।
चंचल किरणें निहार रही किन्तु,
जीवन यौवन भी उदास नहीं है।।३।।
आ जाओ निंदिया नैन समाओ,
खिन्न मन में कोई उल्लास नहीं है।
पीर पनपती, धीर नहीं मुझको,
मधुर मिलन की आस नहीं है।।४।।
सुध नहीं है उलझन की आड़ में,
उनके अंतर्मन भी त्रास नहीं है।
हा! पिया के नित प्रेम मिलन में,
यौवन कानन में प्रवास नहीं है।।५।।
-देवनन्दन कुमार
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