जिसके वक्ष स्थल में सदा,
प्रवाहमय अमृत सागर है।
जिसके नयनों में करुण रस,
मोती सम भरी हुई गागर है।।१।।
सृष्टि की रचना की जिसने,
अचल सुख से अभिप्रेत किया।
जननी जीवन की आश्रय स्थल,
वक्ष दुग्ध पान से सचेत किया।।२।।
भुज में अनन्त शक्ति संचारित,
जीवन रण में वह विजय उत्सव।
मना रही होगी आँचल उठाकर,
खींच स्वर्ण रेखा वह नव उत्सव।।३।।
अभय दान की उच्च पराकाष्ठा,
असीमित परिसीमन बोध उनमें।
लक्षित लांछन सहकर ही सदैव,
अपरिमित ममत्व महिमा उनमें।।४।।
- देवनन्दन कुमार
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