वह आज भी सुखी पत्तियां बटोर रही है;
इस चिलचिलाती धूप में।।१।।
बदन वस्त्रविहीन, रूखे बाल उड़ रहे हैं;
एक पुरानी फटी बोरी पीठ पर लिए हुए हैं;
बटोरी गईं पत्तियां रख रही है सावधानी से;
इस चिलचिलाती धूप में।।२।।
मैं गुजर रहा था उसी राह, देखता रहा उसे;
कुछ गा रही थी, मगन थी भर यौवन काज;
मानो बेखबर, बेअसर सी, गरम गरम हवा;
इस चिलचिलाती धूप में।।३।।
जिंदगी ने हसीन सपने नहीं दिए कभी उसे;
वो एहसास भी नहीं कि _ गम कितनी उसे;
दो वक्त की रोटी शायद, मिलती होगी उसे;
इस चिलचिलाती धूप में।।४।।
वह आज भी सुखी पत्तियां ही बटोर रही है;
इस चिलचिलाती धूप में।।५।।
-देवनन्दन कुमार
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