भादव मास मन अति चंचल,
सावन जनू भींगे तन अरसो।
प्राकृत प्रदत्त मेघ सघन मन,
बरस - बरस, सरस - बरसो।
बदरिया...उमड़ घुमड़ बरसो।।१।।
आंगन में गूंजे नव किलकारी,
सुहावन पावन दरस - दरसो।
नयन नित कारे कारे कजरारे,
बाल छवि नित - नित परखो।
बदरिया... उमड़ घुमड़ बरसो।।२।।
काली - घटा, न घमंड - घटा,
व्योम मंडल से, नित - बरसो।
श्याम - सलोना, गोद खेलाऊं,
निर्मल छवि रूप नित दरसो।
बदरिया... उमड़ घुमड़ बरसो।।३।।
आरे बादल! भूमि जल जीव,
पावस ऋतु सम नित बरसो।
मन - मलिन न कर सावन में,
हरख हरख हिय अति बरसो।
बदरिया...उमड़ घुमड़ बरसो।।४।।
पुत्र प्रेम बंधन में हा बांधकर,
नैनन - नीर स्वागत में अरसो।
पिघल गई मन बाल छवि पर,
वात्सल्य प्रेम नित नित बरसो।
बदरिया... उमड़ घुमड़ बरसो।।५।।
-देवनन्दन कुमार
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